भारत का संविधान – भाग 3 मूल अधिकार

मूल अधिकार

वे अधिकार जो लोगों के जीवन के लिये अति-आवश्यक होते है उन्हें मूल अधिकार  कहा जाता है। भारतीय संविधान सभी नागरिकों के लिए व्‍यक्तिगत और सामूहिक रूप से कुछ बुनियादी अधिकार देता है। भारत मे मूल अधिकार की संख्या 6 है, पहले संविधान मे 7 मूलअधिकार थे परन्तु 44 संविधान के अन्तगत 1978 में इसे कानूनी अधिकार बना दिया गया। इसका रक्षक सर्वोच्च न्यायालय/उच्च न्यायालय होता है।संविधान के भाग 3 में सन्निहित अनुच्‍छेद 35 से मूल अधिकारों के संबंध में है

अनुच्छेद 12

इसमें मूल अधिकार की परिभाषा दी गई है

इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो राज्य के अंतर्गत भारत की सरकारऔर संसद् तथा राज्यों में से प्रत्येक राज्य की सरकार और विधान-मंडल तथा भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारतसरकार के नियंत्रण के अधीन सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकारी हैं ।

अनुच्छेद 13 

मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण  करने वाली विधियां दी गई है।

समानता का अधिकार (14-18)

अनुच्छेद14 विधि के समक्ष समता

राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से वंचित नहीं करेगा।

अनुच्छेद15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर समानता

राज्य, किसी नागरिक के विरुंद्ध के केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नही किया जायेगा

अनुच्छेद16 लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता

राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्म-स्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा।

अनुच्छेद 17 छुआ छूत  का अंत

छुआ छूत का अंत किया जाता है अस्पृश्यता से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।

अनुच्छेद 18 उपाधियों का अंत

राज्य, सेना या विद्या संबंधी सम्मान के सिवाय और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा। भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा।

स्‍वतंत्रता का अधिकार (19-22)

अनुच्छेद19 वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण

1बोलने की स्‍वतंत्रता

2जमा  होने व सभा करने की स्वतंत्रता

3संघ या यूनियन बनाने की स्वतंत्रता

4कही आने-जाने की स्वतंत्रता

5निवास करने और कोई भी व्‍यवसाय करने की स्‍वतंत्रता (कश्मीर को छोड़कर)

अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण

(1) कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए तब तक सिद्धदोष नहीं ठहराया जाएगा, जब तक कि उसने ऐसा कोई कार्य करने के समय, जो अपराध के रूंप में आरोपित है। उसे उसी समय के कानून के तहत दण्डित किया जायेगा जो अपराध करते समय लागू था।
(2) किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दंडित नहीं किया जाएगा।
(3) किसी अपराध के लिए अभियुक्त किसी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुंद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा

अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण

किसी व्यिक्त को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा

अनुच्छेद 21 (क) शिक्षा का अधिकार

छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले सभी बालकों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा

अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी  से संरक्षण

किसी व्यक्ति को जो गिरफ्तार किया गया है, ऐसी गिरफ्तारी के कारणों से यथाशीघ्र अवगत कराए बिना अभिरक्षा में निरुंद्ध नहीं रखा जाएगा उसे अपनी रुंचि के वकील से परामर्श करने का अधिकार होगा गिरफ्तारी से चौबीस घंटे की अवधि में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा और ऐसे किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना उक्त अवधि से अधिक अवधि के लिए अभिरक्षा में निरुंद्ध नहीं रखा जाएगा।

शोषण के विरुद्ध अधिकार (23-24)

अनुच्छेद 23

बलात्श्रम पर रोक

मानव खरीद विक्री पर रोक  दुर्व्‍यापार

सरकारी रेट से मजदूरी कम नही दी जायेगी

अनुच्छेद 24

कारखानों आदि में 14 वर्ष से कम बालकों को नही लगाया जायेगा ।

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (25-28)

अनुच्छेद 25

कोई भी व्यक्ति किसी धर्म को मान  सकता है उसका प्रचार कर सकता है  इसके अन्दर सिक्खो को कटार रखने कि आजदी प्राप्त है

अनुच्छेद 26

धार्मिक  प्रबंध के लिये सम्पत्ति अर्जन करने की स्‍वतंत्रता।

अनुच्छेद 27

राज्य किसी विशिष्‍ट धर्म की आय पर TAX नही लेगा

अनुच्छेद 28

राज्य व्दारा पोषित शिक्षा संस्‍थाओं में धार्मिक शिक्षा नही दी जायेगी।

संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार

अनुच्छेद 29

राज्य द्वारा पोषित या राज्य-निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा ।

अनुच्छेद 30

धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्फसंख्यक-वर्गों को  शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा ।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

डॉ॰ भीमराव अंबेडकर ने संवैधानिक उपचारों के अधिकार को ‘संविधान की आत्मा कहा है सर्वोच्च न्यायालय 5 प्रकार के लेख जारी करता है।

  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरणइसके द्वारा किसी भी गिरफ़्तार व्यक्ति को 24 घण्टे के अन्दर न्यायालय के सामने प्रस्तुत किये जाने का आदेश जारी किया जाता है। यदि गिरफ़्तारी का तरीका या कारण ग़ैरकानूनी या संतोषजनक न हो तो न्यायालय व्यक्ति को छोड़ने का आदेश जारी कर सकता है।
  2. परमादेश यह आदेश उन परिस्थितियों में जारी किया जाता है जब न्यायालय को लगता है कि कोई सार्वजनिक पदाधिकारी अपने कानूनी और संवैधानिक कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहा है और इससे किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहा है। यह उनके कार्यो के प्रति आदेश होता है।
  3. प्रतिषेध जब कोई निचली अदालत अपने अधिकार क्षेत्र को अतिक्रमित कर किसी मुक़दमें की सुनवाई करती है तो ऊपर की अदालतें उसे ऐसा करने से रोकने के लिए प्रतिषेध लेख जारी करती हैं। अर्थात कोई भी न्यायालय अपने कार्य क्षेत्र के बाहर सुनवाई नही कर सकता
  4. अधिकार पृच्छा : जब न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिस पर उसका कोई कानूनी अधिकार नहीं है तब न्यायालय ‘अधिकार पृच्छा आदेश’ जारी कर व्यक्ति को उस पद पर कार्य करने से रोक देता है।, अधिकारी के योग्यता सम्बन्धी जांच
  5. उत्प्रेषण जब कोई निचली अदालत या सरकारी अधिकारी बिना अधिकार के कोई कार्य करता है तो न्यायालय उसके समक्ष विचाराधीन मामले को उससे लेकर उत्प्रेषण द्वारा उसे ऊपर की अदालत या सक्षम अधिकारी को हस्तांतरित कर देता है

अनुच्छेद 33

कुछ स्थानो जैसे सेना IB पर मूल अधिकार समाप्त कर दिये जाते है।

अनुच्छेद 34

जहां पर मार्सल ला लागू हो वहां पर कुछ मूल अधिकार समाप्त कर दिये जाते है।

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